Advertisement

कैसे बन गया औरंगाबाद खजुहा ,क्या ब्राम्हणनें बसाया था खजुहा

Pankaj Panday
Friday, November 23, 2018 | November 23, 2018 WIB Last Updated 2021-02-23T06:11:39Z
फतेहपुर का ज्ञात इतिहास वैदिक युग के रूप में पुराना है। जनरल कर्णिंग ने वैदिक युग के अवशेषों के बारे में चर्चा करते हुए इस जिले के “भितौरा” और “असनी” स्थानों के बारे में लिखा है। इस बात के सबूत हैं कि चीनी यात्री ह्वेनसंग ने इस जिले के आसानी जग

फतेहपुर शहर के दक्षिण-पश्चिम में 25 किमी दूर गांव रेन्हा में, पुरातात्विक हित के कुछ लेख पाए गए हैं जो 800 बीसी के समय हैं। । मौर्य काल के सिक्कों, ईंटों, मूर्तियों आदि जैसे कई लेख जिला के माध्यम से कुसाद काल और गुप्ता काल पाए गए हैं। गुप्ता काल के कई मंदिर अभी भी गांव तेंदुली, कोरारी, सरहान बुजुर्ग इत्यादि में मौजूद हैं, जो पुरातात्विक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण हैं। चंद्रगुप्त -2 की अवधि के स्वर्ण सिक्के गांव बिजौली से बरामद किए गए हैं। असानी के किले में इस्तेमाल की जाने वाली ईंटें भी गुप्त अवधि के हैं।
मुगल शासन के दौरान, फतेहपुर का नियंत्रण समय-समय पर जौनपुर, दिल्ली और कन्नौज के हाथों में स्थानांतरित हो गया। 1801 एडी में, यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आया और 1814 में इसे उप-विभाजन (परागाना) की स्थिति दी गई, जबकि मुख्यालय भितौरा में था, जो अब एक ब्लॉक कार्यालय है। 1826 एडी में, फतेहपुर को जिला मुख्यालय के रूप में फिर से डिजाइन किया गया था।
खजुहा: ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ
लेखक श्री सुशील कुमार शर्मा, परगनाधिकारी, बिन्दकी
फतेहपुर जनपद में खजुहा एक ऐसा ऐतिहासिक स्थान है जो राजनीति, व्यापार, साहित्य और कला के कितने ही सन्दर्भ, लेाक किम्वदन्तियाँ आने से जोड़े हुए चला आ रहा है। खजुहा के विषय में जो कुछ इतिहास सम्मत माना जाता है उसकी आधार भूमि हीवेट का ” Statistical Discriptive and Historical Account of north – western Porvinces of india Vol III Part III Fatehpur”है। इस पुस्तक में कुछ महत्वपूर्ण दिप्पणियाँ और ऐतिहासिक कड़ियाँ एफ0एस0 ग्राउज महोदय ने भी जोड़ी है, जिनका महत्व हीवेट से अधिक प्रामाणिक माना जाता है। हीवेट महोदय की निष्पत्तियाँ इस प्रकार है ’खजुहा टाउन कोड़ा परगना के अन्तर्गत है जो फतेहपुर से 21 मील और जहानाबाद से 12 मील है। यह 26-3’-12’’ अक्षांस और 80-34’-4’’ देशान्तर में स्थित है। यहाँ अक्टूबर के महीने में मेला लगता है। टाउन धनुष बनाने वालों तथा बर्तन बनाने वालों के लिये विख्यात है।
कस्बा लकना खेड़ा और खजुहा दो पुराने गाँव थे जहाँ खजूरों के पेड़ अधिक थे। 1659 में औरंगजेब ने जब शुजा पर विजय पाई तो उने लकना खेड़ा, नंदापुर को मिलाकर एक टाउन बना दिया। उसने एक तालाब सरांय बनवाई और बाग लगवाया और इस स्थान का नाम औरंगाबाद रखा लेकिन यह नाम प्रचलित न हुआ। यहाँ पर नील के कारखाने है जो फर्नियर के स्थापित किये है। फर्नियर 1857 के गर में मारे गये। टाउन में दो-तीन मस्जिदे और कई मन्दिर है। 1712 में इसी स्थान पर फर्रूखसियर और जहाँदरशाह के पुत्र ऐजुद्दीन के बीच घमासान लड़ाई हुई थी। इस टाउन में 1029 मकान थे जिनमें 470 में टैक्स लगता था और 4 आना 7 पाई प्रति वयस्क कर लगता था।
यहाँ की कुछ अन्य विशेषताओं की ओर ग्राउज महोदय गजेटियर भी उल्लेख करता है। ग्राउज के अनुसार ’सराय 10 एकड़ से अधिक भूमि पर बनी है जिसमें 130 जोड़ी कमरे बने है। इसमें दो बड़े विशाल फाटक है। (देखें प्लेट-1) पूर्व की ओर गेट से चलकर जो सड़क जाती है उसी में गाग बादशाही का बड़ा फाटक लगा है जिसका क्षेत्र लगभग 18 एकड़ है, यह चारों ओर दीवार से घिरा है जिसके कोनो मे बड़े-बड़ें बुर्ज है। बीच में फहारा लगाने का स्थान है जो कटावदार पत्थरों से निर्मित है। यह एक ऊँचे और चैड़े चबूतरे पर बना है, जिसमें पूर्व और पश्चिम की तरफ विश्राम कक्ष बने है (प्लेट नं0 2)। इसके एक भाग को नील निर्माताओं ने ले रखा है। इसके पूर्व की ओर एक बहुत बड़ा तालाब है। इस टाउन मेें मन्दिरों की संख्या बहुत है। इन मन्दिरों में दो बहुत ही सुन्दर और महत्वपूर्ण है जिनके साथ तालाब बने हुए है। एक मन्दिर ’जामुनी’ के नाम से प्रसिद्ध है जो किसी बनिया की विधवा का बनवाया हुआ है और दूसरा ’तुलाराम’ के नाम से विख्यात व्यक्ति का बनवाया हुआ है। ग्राउज महोदय ने यह भी लिखा है कि दोनों मन्दिर, बाग बादशाही के दोनों कक्ष और सराय के फाटक के चित्र लिये गये है और उनके निगेटिव रूड़की कालेज में रखे गये है।
हीवेट महोदय के अनुसार खजुहा शब्द सम्भवतः खजूर के पेड़ों की अधिकता के कारण अपना नाम सार्थक करता है। सबसे पहली समस्या नाम और स्थापना ही है जो निश्चित रूप से इतिहास को ललकारती है। खजुहा खब्द की व्युत्पत्ति में यदि खजूरों का हाथ है तो जिस प्रकार का खजुहा नाम है उसी प्रकार खजुरिहा, खजुरगाँव, खजुरहट और खजुराहो भी है जिनमे ’खजुर’ शब्द स्पष्ट पाया जाता है। इतिहास में कहीं-कहीं खजुहा को ’खजुआ’ भी लिखा गया है जो उसकी प्राचीनता को द्योतित करता है। साहित्य में भी ’खजुवा’ ही प्रयुक्त हुआ है-
’दारा की दौरि यह खजुए की रारि नाहिं बांधिवो न होय यह मुराद साह वाल को।’
सर जदुनाथ सरकार न भी इसी नाम का प्रयोग किया है ’दारा का पीछा करते हुए सुदूर पंजाब पहुँच औरंगजेब की गैरहाजिरी के समाचारों ने शुजा की महत्वाकांक्षा को पुनः जाग्रत कर दिया। इस प्रकार शुजा 30 दिसम्बर को इलाहाबाद से आगे तीन दिन की यात्रा की दूरी पर स्थित खजवा नगर जा पहुँचा। यहाँ उसने सुल्तान मुहम्मद को अपना मार्ग रोके हुए पाया। इसी समय औरंगजेब तेजी से चलकर दिल्ली की ओर वापस आया था और 2 जनवरी 1656 को औरंगजेब शुजा के पड़ाव से 8 मील पश्चिम में कोड़ा नामक स्थान पर अपने पुत्र के साथ आ मिला। उसी दिन मीर जुमला भी दक्षिण से वहीं पर आ पहुँचा।
निष्कर्ष रूप में खजुहा औरंगजेब से पहले ही विद्यमान था और उसे खजुहा, या खजवा भी कहते थे। खजुहा के लिए एक नाम फतूहाबाद भी प्रसिद्व है और यहाँ के शुक्ल (उपजाति) ब्राम्हण अपने को फतूहाबादी शुक्ल कहते हैं। ‘कान्यकुब्ज दर्पण‘ जो एक पुरानी पोथी है, उसमें इसका उल्लेख है। इस पोथी के कुछ पन्ने जिनमें संवत् और लेखक का नाम अप्राप्य है मैने प्रघान सम्पादक डाॅ0 ओम प्रकाश अवस्थी के पास देखी थी। पुस्तक की भाषा, लिपि, लिखने का ढंग काफी पुराना है। ‘गणपति पुरवा से निकसि कै फतूहा जाइ बसे गणपति के वंश को गंगाराम ने फतूहाबाद में बसाया गंगाराम डोमनपुर से निकसि कै खजुहा में वसे देवी छिन्नमस्ता के उपासक रहे और अकबर बादशाह मुल्क फतेह करके खजुहा के पास वास किया और गंगाराम को बुलाया कुछ सिद्वता का प्रताप भी अकबर बादशाह को देखाया तब सिद्वता को देखकर खजुहा का नाम फतूहाबाद रखा तब से फतूहाबादी कहलाये। सांकृत गोत्र शुक्लों का असामी स्थानी विश्वा लिख्ते।
गणपति फतूहा के 20
गंगाराम फतूहा के 20
खजुहा के फतूहाबाद नाम की पुष्टि और भी है। असोथर के राजा भगवन्त राय खीची के यहाँ एक चतुरेस नाम का कवि था जिसने गाजीपुर से कुछ स्थानों की दूरी कवित्त के माध्यम से बताई हैः-
आठ कोस असनी भिटौरा है नवै कोस
पाँच कोस किशुनपुर एकडला के पास है।
तीस कोस कानपुर फतूहाबाद बारा कोस
बीस कोस चित्रकूट जहां रामदास हैं।
तीस कोस प्रागराज काशी है साठ कोस,
डेढ़ को स सूर्य सुता करत पाप नास है।
खीची भगवन्तराय भूपं मेरो चतुरेश नाम
गाजीपुर परगना असथोर में वास है।
प्रतीत ऐसा होता है कि अकबर का दिया फतूहाबाद और औरंगजेब का दिया नाम औरंगाबाद सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मोह तथा परम्परा संरक्षण के कारण चल नहीं सके। जनश्रुति में जिसके प्रति रागात्मकता विद्यमान थी वह नाम परिर्वतन के पगति उत्सुक नहीं थी।
खजुहा मुगल रोड पर स्थित है, जो मुगल काल का राजमार्ग या शाही मार्ग था। मुगल रोड का उल्लेख 1527 से मिलता है। जब कड़ा जौनपुर जीतकर कड़ा होते हुए अकबर इसी मार्ग से 1561 में जौनपुर गया था ओर लौटा था। इससे सिद्ध होता है कि हो न हो अकबर ने पंड़ित जी की सिद्धि से प्रभावित हो उन्हें खजुहा की कुछ जायदाद प्रदान की हो और उसे फतूहाबाद के नाम से प्रचलित रखने को कहा हो तथा गंगाराम, फतूहाबादी शुक्ल कहलाए हो और यह नाम कुछ दिनों तक खजुहा के साथ-साथ प्रचलित भी रहा हो क्योंकि चतुरेश और भगवन्तराय का काल 18वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध है। खजुहा नाम आल्हा में भी मिलता है। जिस प्रकार नैनागढ़, पैनागढ़, जूनागढ़ आदि है वैसे ही खजुहा भी है।
’बैठत मांगत हैं खजुहा की मांगै राज्य ग्यालियर क्यार।
खजुहा गढ़ के वीर जुझारू तिनकी बड़की है तरवारि।
आल्हा खण्ड में खजुहागढ़ का उल्लेख है। यहाँ की बैठक की इतनी प्रसिद्धि थी कि पृथ्वीराज ने राज परिमाल से इसकी मांग की थी ’बैठक माँगो खजुहा गढ़ की। इसका उल्लेख ’कीरत सागर मैदान’ में है। तात्पर्य यह कि वह नाम पुराना है । आल्हा चन्देल वंशी राजाओं की लोक संस्कृति से जुड़ी हुई शैर्य गाथा है, जिसमें अतिरंजना का पुट तो है परन्तु स्थानों के नाम तो ऐतिहासिक है और आज जहाँ खजुहा है वह स्थान कभी चंदेलों के शासन में रह भी चुका है। चन्देलों ने कन्नौज की सहायता से इसे अपने राज्य में मिलायाथा। ’चंदेल वंशी राजपूत बुन्देल खण्ड में राज्य करते थे और इसके दक्ष्ज्ञिण पूर्व एवं उत्तर में चेदि मण्डल के कलचुरियों का राज्य था। कलचुरियों ने दक्षिणी कोशल और निकटस्थ भागों में अपनी शक्ति जमा ली थी। यह भी सत्य है कि कलचुरियों को अन्र्वेद में भी सफलता मिली और वे गोरखपुर तक अधिकार बढ़ाते चले गये। इसमें युद्ध हुआ …….
यह प्रतीत होता है कि कन्नौज के राजा महिपाल को अपने सौतेले भाई को राज्य सिंहासन पर बिठाने में आपत्ति थी। इसलिए उस सौतेले ने चेदिवंशियों से गठबन्धन किया और महीपाल ने चन्देलों से । आगे चलकर यह क्षेत्र चन्देलों के हाथ में पूरी तरह आ गया ।

इस प्रकार चंदेलों ने आपने राज्य का विस्तार बनारस तक कर लिया। जब वे बुन्देलखण्ड के उत्तर में चेदि राजाओं को पराजित कर बनारस तक अपने साम्राज्य का विस्तार कर चुके तो निश्चित रूप से आज जहाँ खजुहा है वह क्षेेत्र चंदेलों के राज्य में रहा होगा।
चन्देलों में धंग प्रतापी राजा था। इसने अपना अभिलेख सं0 1059 में लिखवाया ’श्री खजूर वाहके राजश्री धंग देव राज्ये’ और यशोवर्मन के खजुराहों लेख से उसके राज्य-विस्तार का पता लगता है। कालंजर पर यशोवर्मन ने अधिकार कर लिया था और कालंजर की स्थिति महत्वपूर्ण होने के कारण धंग ने कालंजर को ही राजधानी बनाया तथा कालंजराधिपति की उपाधि ग्रहण की और इसके राज्य का विस्तार निम्न श्लोक में वर्णित है-
आकालंजरमाच मालवनदीती रस्थिते भास्वतः।
कालिन्दी सरितस्तटादित इतीप्या चेदि देशावधे।।
आतस्यादपि विस्मयैकनियाद गोपाभिधानीदिगरे।
यं शास्ति क्षित्तिमायर्तोजित भुज व्यापार लीलाजितां।।
इसके अनुसार धंगदेव ने अपने पराक्रम से सहज में ही काजंजर से मालव नदी पर स्थित भस्वत भिलसा तक की कालिन्दी नदी के तट से चेदि देश की सीमा तक तथा वहाँ से गोपागिरि (ग्वालियर) तक विजित किया था। इतना ही नहीं भोज के वराह ताम्र पत्र लेख से ज्ञात है कि कालंजर मण्डल कान्यकुब्ज भूमि में सम्मिलित था।
चन्देलवंशी राजओं का ’खर्जूर’ शब्द से घनिष्ट सम्बन्ध है। ’खर्जूर’ संस्कृत का शब्द है, जिसका तद्भव रूप खजूर होता है और इसे सुरक्षित माना गया है। ’हिन्दी में यह साधारण सुरक्षित है यथा खजूर-खर्जूर। चन्देलों को खजूर वाहक में ही उत्पन्न माना गया है और ऐसा माना जाता है कि ‘खर्जूरवाहक‘ खजूराहो का पूर्वरूप है।
शब्द खर्जूरवाहक की दो प्रकार की लिखावट है। एक तो खर्जूरवाहक में तथा दूसरी निम्न ढंग से-
शुभ कर्णवती के तीर तव पुत्र होव सुवीर।
षज्जुर पुर फिरि जाय दिय दाय जज्ञ कराय।।
लेकिन आगे चलकर यह ग्राम्य नाम उपाधि बन गया ’श्री अर्जूहवाह के राज श्री धंगदेव राज्ये’ और ’श्री से युक्त होने पर इसकी उपाधि में संशय नही रहा। यह वह यश धर्मा उपाधि नही थी तो स्थान धर्मा तो थी ही जैसे देवलवी, अजमेरी, बनारसी आदि। जिस प्रकार ’खर्जूरवाहक’ से मुख-सुख के आधार पर खजुराहो बन गया। और खजुराहो का ’ह’ वाहक के ’ह’ के कारण ही आ पाया। खजूर या खर्जूर में तो कही में तो कही ’ह’ है ही नही तो फिर ’खजुहा’ में ’हा’ का प्रयोग क्योंकर होने लगा। ऐसा हो सकता है कि मुख-सुख के आधार पर…..’हा’ जुड़ा हो यथा बाग-बगहा, पीपर-पिपरहा हो जाता है उसी प्रकार खजूर-खजुरहा-खजुहा हुआ हो लेकिन ’र’ का लोप आकस्मिक नहीं है।
यदि मान लिया जाय कि इसका नामकरण खजूर के पेड़ों की अधिकता के कारण हुआ था तो ऐसी दशा में अकबर का प्रस्तावित नाम फतूहाबाद और औरंगजेब का का औरंगावाद चल निकले होते। इसके पीदे कोई ऐतिहासिक आस्था रही होगी, जिसने इसके बदलने में मानसिक आपत्ति की होगी।
खजुहा में चारो दिशाओं में तालाब है। सबसे पुराना तालाब दक्षिण दिशा की तरफ रानी सागर नामक तालाब है, जो किसी हिन्दू नरेश का बनवाया हुआ है। वहाँ रानियों के स्नान करने का अच्छा प्रबन्ध है। खजुहा की छोटी काशी के नाम से भी पुकारा जाता है। वहाँ रानियों के स्थान करने का अच्छा प्रबन्ध है। खजुहा की छोटी काशी के नाम से पुकारा जाता था। यहाँ से थोड़ी दूर हटकर पंथेश्वरी देवी का मन्दिर भी है। इसकी 50 कोस की परिक्रमा मानी जाती थी और इनकी देवियों की संख्या 6 थी। इन किम्वदन्तियों से इतना निष्कर्ष अवश्य निकलता है कि यह स्थान मुसलमानी शासन से पहले ही अपनी ऐतिहासिकता और जनप्रियता पाये हुए था और विभिन्न शासकों के समय में इसका रूप भी परिवर्तित होता रहा है। इन जनश्रुतियों और ऐतिहासिक प्रमाणें के आधार पर यह सिद्व हो जाता है कि सन्देलवशंी राजा घंगदेव ने चेदि वंशी कलचुरियों को जब यमुना की उत्तरी सीमा से खदेड़ा हो और उन्हें विजित किया हो तो उसने ‘खर्जूरवाहक‘ की अपनी उपाधि के कारण स्थान का नामांकन किया हो, जो आगे चलकर खजुहा के नाम से प्रचलित हुआ और अब तक चला आ रहा है।
फतेहपुर में चंदेलों के विस्तार के विषय में दो मत हैं। हीवेट महोदय मानते हैं कि यह लोग महोबा से कालपी होकर कन्नौज आये और फिर गंगा के किनारे शिवराजपुर हथगाँव, कुटिया, गुनीर आदि स्थानों में बस गये।

इस प्रकार यह माना जाता है कि इस वंश की उत्पत्ति मालवा में हुई जहाँ से महोबा तथा फिर कन्नौज तक विस्तृत हुआ। इस जिले में गाजीपुर के पास पैनागढ़ का प्राजीन दुर्ग इन्हीं चन्देलों का बनवाया हुआ कहा जाता है। कुटिया, गुनीर और हथगांव में चन्देल बहुसंख्या में हैं। इस समस्त सामग्री और ऐतिहासिक विवरणों से यह सिद्ध होता है कि दसवीं शताब्दी में फतेहपुर जनपद का भूभाग चंदेलों के अधिकार में था। गंगा के किनारे-किनारे बसने का मूल कारण कन्नौज की ओर से आकर बसना नहीं रहा होगा बल्कि चेदिवंशी कलचुरियों को गंगा पार खदेड़ देने और फिर पुनः न आने देने के लिये युद्ध की सामरिक सुरक्षा रही होगी। इसी बीच ’खजूरदेव’ नामक वह बुन्दलीखण्डी गाँव यश और उपाधि बन गया था जिसकी आस्था ने खजुहा ऐसे स्थानों में गढ़ (किले) बनाये होंगे। इस किले का उपयोग उन सभी शासकों ने किया होगा जो शासक रहे होंगे और अपनी आवश्यकता और संस्कृति के अनुसार उसके रूप को बदलते रहे होंगे।
नामकरण और ऐतिहासिकता के साथ-साथ अन्य विषय जो इसके साथ जुड़े है वह है इसका व्यापार और संस्कृति का स्वरूप। खजुहा की चारों दिशाओं में चार तालाब हैं। पूर्व की ओर औरंगजेब के द्वारा निर्मित बाहशाही तालाब है, पश्चिम में रोंड़ो का तालाब, उत्तर में तुलाराम का तालाब और दक्षिण में रानी सागर नामक तालाब है। दक्षिण दिशा वाला तालाब ही सबसे पुराना है। निःसन्देह इन सरोवरों में दर्पण की तरह भरा हुआ जल उस युग के न जाने कितने ही सौन्दर्शप्रधान बिम्ब अपने अन्दर छिपाये होगा। जिनकी सीढ़ियों में स्नानार्थियों के चरण पड़ते ही तालाब अपना धन्य भाग्य मानते रहे होंगे। जायसी की उक्ति ‘पावा रूप रूप के दर से’ सार्थक हो उठता रहा होगा। पंडितों, पुजारियों, आस्थावान आस्तिक गृहस्थों के श्लोक मंत्रोच्चारों से सरस्वती का देवभाषा रूप निनादित होता रहा होगा, वही कवि हृदय उन कंगूरों में बैठकर नायिकाओं के सौन्दर्य पर मुग्ध होते रहें होंगे और सद्यःस्नाता नायिकाओं का स्वरूप वर्णन करने में उन्हें यहीं से प्रेरणा मिलती रही होगी। इतना ही नहीं समाज की मर्यादा, शासन की आँकुशी और मन की चंचलता इन कवि हृदयों में सहज ही उद्वेलन और अन्तद्र्वन्द्व भरती रही होगी और कविता-कामिनी का रीतिकालीन वैभव बिखरता रहा होगा। विभिन्न क्षेत्रों से युद्ध लिप्सा में निकले हुए युद्ध वीर अपने वाहनों को यहीं जलपान कराने के लिए आ उपस्थित होते रहे होंगे और इनके कवच, शिरस्त्राण, आयुधों की झनकार सुशोभित और झंकृत होती रही होगी और इन्हीं स्थानों में युद्ध भूमि का बहा रक्त प्रक्षालित होकर सरोवरों के जल को भी रक्तिम वर्ण करता रहा होगा। घाटों में यात्रियों, यायावरों गुप्तचरों का जमघट एक ओर रहा होगा अपनी दासियों, बाँदियों, सहेलियों, सेविकाओं को साथ लिए रानियाँ और राजकुमारियाँ इतराती रही होंगी तो युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त होने पर सैकड़ों की संख्या में देवियों के हाथों के केयूर, कंकन, चूडियाँ, उतरती रही होंगी। शोक और हर्ष, उल्लास और भय का समवेत मानक एक साथ गुंजरित होता रहा होगा। इसी बीच में वृद्धा वैष्णवी आपबीती सुनाकर हर तरह की सांत्वना से नयी पीढ़ी को साहस देती रही होंगी और न जाने कितने युगल प्रेमियों के बिहार स्थल रहे होंगे। दूसरा सांस्कृतिक वैभव उन मन्दिरों का है जिनके कारण इस स्थान को छोटी काशी का गौरव प्राप्त था। खजुहा, शिवराजपुर, भिटौरा और असनी की यात्रा चारों धाम की सी यात्रा थी। छिन्नमस्ता देवी, पंथेश्वरी देवी, राधाकृष्ण की युगल मूर्ति, शंकर शिवाले भिन्न-भिन्न धार्मिक स्मार्तों के धर्म केन्द्र और पूज्य बुद्धि के संचार स्थल थे जिनका स्थापत्य आज भी आकर्षित करता है। जामुनी देवी का बनवाया हुआ मन्दिर, तुलाराम का मन्दिर तो इस समय भी अपने वैभव को प्रदर्शित करते हैं जिनमें विभिन्न देवी देवताओं की प्रस्तर मूर्तियाँ, अन्तरंग भाग के दूसरे प्रकोष्ठ में गृहों के चित्र, साथ में अपने वाहनों को लिये हुए और तीसरे स्तर पर छत के साथ लगे हुए युगल मूर्ति देवता। दक्षिणी स्थापत्य कला का सुन्दर आकर्षण इन मन्दिरों की विशेषता है। (प्लेट नं0 3) नीचे भरा हुआ विशाल तालाब जिसका जल में पड़ता हुआ प्रतिबिम्ब उतना ही आकर्षक और रूपवान दिखाई देता है जितना मन्दिर। लेकिन जल में फेंकी हुई कंकड़ी उस सौन्दर्य को चंचल कर देती है और मन्दिर अचल और अडिग खड़ा है। ब्राह्मणों का जैसे यह वास-स्थल ही बन गया और ब्रह्मापूजक आराधक यहीं जुड़ने लगे। वर्ष में कार्तिक के महीने में एक बार रावण-वध की लीला जिसमें हजारों दर्शकों का जमघट। फतेहपुर में इतना विशाल मेला उस मसय कोई नहीं था जिस समय हीवेट ने गजेटियर पर लिखा। सन् 1886 में हीवेट ने बीस हजार दर्शकों का उल्लेख किया है। इसके साथ ही मन्दिरों के कंगूरों के साथ ही वातायान में मस्जिदों के गुम्बज भी दर्शनीय है और जिनकी उच्चता वहाँ काला वैभव का साकार रूप है वहीं उनके अल्लाह हो अकबर का पद प्रदान करने वाली वे अजान की आवाजें भी हैं जो उतनी ही बुलन्द हैं जैसे मीनारों और मस्जिदों की चोटियों की लम्बाई से और ऊपर चली जाकर खुदा के कर्ण कुहरों में अपनी इबादत पहुँचाकर कृतकृत्य होना चाहती हैं। कहते हैं कि सरांय जिसमें 130 कमरे, दो विशाल प्रवेशद्वार, बाग बादशाही, औरंगजेब की बनवाई है और कुछ मानते हैं कि शाह शुजा की। शाहजहाँ के दोनों ही पुत्र अधिकार और वैभव के लिए, यहीं लड़े। कोड़ा में औरंगजेब और खजुहा में शुजा। 10 मील की यह धरती खून से रंग गई। घटना 1659 ई0. में घटी और इसके बाद ही 1712 ई0. में फर्रूखसियर और ऐजुद्दीन में युद्ध ठन गया। यह भी इस धरती पर ही हुआ। 1734 ई0. में असोथर के राजा भगवन्तराय खींची के दमन के लिए 70 हजार घुड़सवार दिल्ली से आये और युद्ध हुआ। क्या ऐसा हो सकता है कि कोड़ा में स्थित भगवन्तराय की सेना और मुगल सेना से खजुहा अप्रभावित रहा हो। इसका विवरण हीवेट की गजेटियर पृ. संख्या 87 में दिया है लेकिन वह दूसरे स्थान की गाथा है।
जहाँ तक खजुहा के व्यापारिक और उद्योगीकरण की व्यवस्था का प्रश्न है। यह स्थान व्यापार की दृष्टि से बहुत ही समुन्नत था। इसके पास से जाने वाली सड़के इस गंगा और यमुना के धारों से जोड़ती थीं और कुछ ऐसे भी कच्चे मार्ग थे जो इस शहर की व्यापारिक व्यवस्था के लिए बड़े ही उपयोगी थे। प्रारम्भ से ही सैनिक स्थान होने के कारण सर्वाधिक वस्तुयें सैन्य से सम्बन्धित बनती थीं, जिनमें धनुषबाण, नाव के आगे का हिस्सा, ढालें और घोड़े की नालें बनाई जाती हैं। ग्राउज महोदय ने इसके 12 मुहल्लों का उल्लेख किया है। अब भी खजुहा के अधिकांश मुहल्ले उन्हीं कारीगारों के नाम पर ही आबाद है। कारीगरी और हस्तकौशल का यह केन्द्र था। दवगर, सिकलीगर, कमगर, कसगर आदि मुहल्ले अब भी हैं। भवन निर्माण करने वाले, मूर्तियाँ बनाने वाले भी थे। सबसे उल्लेखनीय वस्तु जो यहाँ बनती थीं वह है गंजीफा। यह एक प्रकार का ताश है जिसे 96 पत्तों से खेला जाता था। इसमें 8 रंग के 12-12 पत्ते होते थे।
व्यापारिक यातायात नाव, ऊँट, घोड़े और बैलगाड़ियों से होता था। जमुना के ललौली, रेह और औगासी घाट से तथा गंगा में शिवराजपुर, भाऊपुर, कुटिया-गुनीर से घाटों से माल आता जाता था। मुगल रोड इसे प्रान्त के दोनों सूबों कड़ा और कोड़ा से जोड़ती थी। इसके साथ ही बकेवर के पास से बड़ा और कच्चा मार्ग मुसाफा कुडनी होकर जाता था जो मंझावन के पास हमीरपुर रोड से मिलता था। खजुहा से सीधा मार्ग नामामऊ के पास शिवराजपुर जाने वाली सड़क में मिलता था। इस प्रकार चारों दिशाओं से यहाँ के व्यापारियों और सैनिकों का सम्बन्ध जुड़ा था।
आज खजुहा खण्ड विकास का मुख्यालय है जहाँ इस क्षेत्र में विकास की विभिन्न योजनाओं को कार्यान्वित करके समृद्धि के अनेक स्वप्नों को साकार किया जा रहा है। खजुहा की वह भूमि जिसने प्राचीन काल में अपने ऊपर से गुजरती हुई व्यापारिक कारवों की लम्बी कतारों को देखा है, समय-समय पर होने वाली सैनिक मुठभेड़ तथा क्रान्तिकारियों को शहीद होते देखा है, वह अपनी ऐतिहासिक धरोहर को अपने आँचल में सम्भाले हुए इस महत्वपूर्ण और सामयिक परिवर्तन को बड़े सहज ढंग से आत्मसात कर रही है और विकास चक्र को आगे बढ़ने में सहयोग प्रदान कर रही है।
Comments
comments that appear entirely the responsibility of commentators as regulated by the ITE Law
  • कैसे बन गया औरंगाबाद खजुहा ,क्या ब्राम्हणनें बसाया था खजुहा

Trending Now

Advertisement

iklan