Advertisement

चौरी चौरा कांड !! जब 24 पुलिस वालों को जिंदा जलाया गया !

Pankaj Panday
Sunday, February 7, 2021 | February 07, 2021 WIB Last Updated 2021-02-23T08:06:07Z

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के छोटे से दो गांव.. एक गांव का नाम चोरी था और दूसरे गांव का नाम चोरा था...इन दोनों गांव के बीच में बना रेलवे स्टेशन दोनों गांव के लिए सरहद का काम करता था....ये दोनों हो गांव बहुत ज्यादा विकसित नहीं हुए थे...लेकिन 1985 में रेलवे स्टेशन बनने के बाद यहाँ बाजार भी लगने लगा था...1922 आते आते ये दिनों गांव आज़ादी के मतवालों ले लिए आरामगाह बनने लगा....


इधर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया था...पूरे देश में आज़ादी की आग फैल चुकी थी...जगह जगह आज़ादी की मतवालों की टोलियां घूम रही थी...पूरे देश मे अंग्रेजों का और अंग्रेज़ी समान का बहिष्कार किया जा रहा था...और फिर आई 4 फरवरी 1920 की वो तारीख जिसने पूरे देश को हिला दिया...जिसे भारतीय आजादी की लड़ाई में हमेशा याद रखा जाएगा....पुलिस थाने में बंद 24 पुलिस वालों को जिंदा जला दिया गया....लेकिन उस दिन ऐसा क्या हुआ था...क्यो गांधी जी ने पुलिसकर्मियों को ही गलत बताया था...और करीब 3000 लोगों की भीड़ को सही....


कुछ तथ्यों के मुताबिक,  चौरी-चौरा पुलिस स्टेशन के दारोगा ने मुंडेरा बाज़ार में कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं को मारा है. ये बात इतनी बढ़ गई कि पुलिस को लाठीचार्ज और फिर फायरिंग करनी पड़ी थी... पुलिस की कार्रवाई से नाराज करीब 3000 लोगों की भीड़ ने थाने को घेर लिया....नाराज भीड़ पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ थाने को घेर रही थी, तब पुलिसवालों ने थाने के दरवाजे बंद कर लिए. वो अंदर छिप गए. सुखी लकड़ियां, कैरोसिन आयल की मदद से प्रदर्शनकारियों ने थाना में  आग लगाई. ये घटना दोपहर में करीब 1.30 बजे शुरू हुई और शाम 04.00 बजे तक चलती रही... गोरखपुर के चौरी चौरा गांव में घटित इस घटना ने अनजान से एक गांव को चर्चित कर दिया, कुल 24 पुलिस के लोग जलकर मर गए थे....



अंग्रेजों के दस्तावेज के अनुसार इस घटना में तीन प्रदर्शनकारियों की भी मौत हुई थी... हालांकि माना जाता है कि आम जनता की मौत का आंकड़ा और ज्यादा था, जिसे अंग्रेज हुक्मरानों ने बहुत चालाकी से छिपा लिया था...


इस हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने 12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन वापल ले लिया था. महात्मा गांधी के इस फैसले को लेकर क्रांतिकारियों का एक दल नाराज़ हो गया था. 16 फरवरी 1922 को गांधीजी ने अपने लेख 'चौरी चौरा का अपराध' में लिखा था कि अगर ये आंदोलन वापस नहीं लिया जाता तो दूसरी जगहों पर भी ऐसी घटनाएँ होतीं..उन्होंने इस घटना के लिए एक तरफ जहाँ पुलिस वालों को ज़िम्मेदार ठहराया तो वहीं दूसरी तरफ घटना को अपराध मानते हुए इसमें शामिल तमाम लोगों को अपने आपको पुलिस के हवाले करने के लिए भी कहा था....


इस घटना को अंजाम देने के आरोप में 172 भारतीयों को अंग्रेज़ी सेशन कोर्ट से फांसी की सजा मुकर्रर की थी...जिसके बाद दुनिया भर में हंगामा शुरू हो गया था...डर की वजह से अंग्रेज अफसरों ने फांसी की सजा पाने वाले भारतीयों को अलग-अलग जेलों में बंद कर दिया। हाइकोर्ट से भी 19 भारतीयों को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद देश गुस्से में था.... वहीं सजा पाए लोगों ने खुद को बेकसूर बताते हुए सरकार के समक्ष अपनी दया याचिकाएं भेजी थी लेकिन सभी याचिकाये अंग्रेजी हुक्मरानों ने खारिज कर दी....


सभी 19 भारतीय वीरों को अलग-अलग तारीखों पर  जेल में ही फांसी पर चढ़ा दिया..इसके बाद कुछ की लाशें जेल में ही जला दी गई तो कुछ की दफन कर दी गई थी.....



आज़ादी के बाद 1971 में गोरखपुर ज़िले के लोगों ने मिलकर चौरी-चौरा शहीद स्मारक समिति का गठन किया. इस समिति ने 1973 में चौरी-चौरा में 12.2 मीटर ऊंचा एक मीनार तैयार की.....बाद में भारत सरकार ने शहीदों की याद में एक अलग शहीद स्मारक बनवाया है... इसे ही हम आज मुख्य शहीद स्मारक के तौर पर जानते हैं. इस पर शहीदों के नाम खुदवा कर दर्ज किए गए हैं.... बाद में भारतीय रेलवे ने भी दो ट्रेन भी चौरी-चौरा के शहीदों के नाम से चलवाई है. इन ट्रेनों एक या नाम है शहीद एक्सप्रेस और दूसरी ट्रेन का नाम है चौरी-चौरा एक्सप्रेस......


इस घटना से जुड़ा कोई भी तथ्य या आपने विचार आप रखना चाहते है तो कमेंट बॉक्स में दे सकते है....इसके साथ ही आप इसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक शेयर कर सकते है...

Comments
comments that appear entirely the responsibility of commentators as regulated by the ITE Law
  • चौरी चौरा कांड !! जब 24 पुलिस वालों को जिंदा जलाया गया !

Trending Now

Advertisement

iklan